नई दिल्ली: झारखंड के चतरा जिले से आने वाली 18 वर्षीय सबीना कुमारी ने खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2024 में अपने पहले ही प्रयास में दो स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीतकर देशभर का ध्यान आकर्षित किया है। एक दिहाड़ी मजदूर की बेटी और साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली सबीना ने यह उपलब्धि बिना किसी हाई-टेक सुविधा के केवल मेहनत, लगन और आत्मविश्वास के बल पर हासिल की है।
सबीना ने लड़कियों की केरिन और टीम स्प्रिंट स्पर्धाओं में स्वर्ण, जबकि 200 मीटर स्प्रिंट में कांस्य पदक जीता। उन्होंने कहा, “यह मेरा पहला खेलो इंडिया यूथ गेम्स था और मैं बहुत खुश हूं। व्यक्तिगत केरिन स्पर्धा मेरी सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस रही।”
सबीना का खेलों में आना भी एक संयोग था। 2017 में उनके पिता ने झारखंड सरकार के सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड कार्यक्रम के तहत उनका एक फॉर्म भर दिया था। उस समय सबीना को खेलों के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। लेकिन यही छोटा कदम उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया।
सिर्फ 12 साल की उम्र में उन्होंने रांची स्थित झारखंड राज्य खेल संवर्धन सोसायटी (JSSPS) में साइक्लिंग शुरू की और जल्द ही उन्हें कोच राम कपूर भट्ट का मार्गदर्शन मिला। भट्ट ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें स्प्रिंट इवेंट्स में ट्रेनिंग दी। सबीना बताती हैं, “2018 से राम सर के साथ ट्रेनिंग शुरू की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।”
2021 में उन्होंने जयपुर में अपनी पहली राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण और कांस्य पदक जीता, जिससे उनका आत्मविश्वास और बढ़ा। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद, सबीना ने हार नहीं मानी। खेलो इंडिया योजना से मिले सहयोग ने उनके सपनों को पंख दिए।
2024 में सबीना ने दिल्ली में आयोजित एशियन चैंपियनशिप में भारतीय टीम के साथ स्प्रिंट स्पर्धा में स्वर्ण जीतकर अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदक भी हासिल किया। वह अब IG स्टेडियम, दिल्ली में साई नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की एथलीट हैं और फ्रांसीसी कोच केविन सिरो के मार्गदर्शन में तकनीकी दक्षता को निखार रही हैं।
सबीना अब ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना देख रही हैं। अपनी पढ़ाई भी वे स्वअध्ययन के माध्यम से पूरी कर रही हैं और 12वीं की परीक्षा की तैयारी कर रही हैं।
उन्होंने कहा, “मैं झारखंड और अपने कोच राम भट्ट सर की हमेशा आभारी रहूंगी। उन्होंने हमें आगे बढ़ने का सपना दिखाया और आज लगभग 30 बच्चे उनके अधीन साइक्लिंग सीख रहे हैं।”
सबीना की कहानी ग्रामीण भारत की उस क्षमता का प्रतीक है, जो सही दिशा और अवसर मिलने पर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकती है।